Civic Sense

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“जब विचार सो जाते हैं, परंपराएं शासन करने लगतीं हैं”

सिविक सेंस (Civic Sense)

लेखक — गोविंद जाणी

भाषा: हिंदी | प्रकाशक: अरिहन्त प्रकाशन, जोधपुर | ISBN: 978-93-7334-001-2

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एक पिता और बेटी के संवादों के माध्यम से यह किताब उन सवालों से रूबरू कराती है, जिन्हें हम अक्सर देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। यह किसी विचारधारा का प्रचार नहीं करती, बल्कि सोचने, प्रश्न करने और स्वयं उत्तर खोजने का निमंत्रण देती है।

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लेखक के बारे में
गोविंद जाणी एक जिज्ञासु लेखक और स्वतंत्र चिंतक हैं। उनका मानना है कि सभ्यता को आगे बढ़ाने वाले उत्तर नहीं, बल्कि वे प्रश्न हैं जिन्हें पूछने का साहस बहुत कम लोग करते हैं।

समाज, नैतिकता, न्याय, सत्ता, अहंकार और मानवीय व्यवहार जैसे विषय उनके चिंतन के केंद्र में रहे हैं। वे मानते हैं कि हर परिवर्तन की शुरुआत एक जिज्ञासु मन से होती है।

उनकी प्रथम कृति ‘सिविक सेंस’ एक पिता और बेटी के संवादों के माध्यम से पाठकों को उन सवालों से रूबरू कराती है, जिन्हें हम अक्सर देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। यह पुस्तक किसी विचारधारा का प्रचार नहीं करती, बल्कि सोचने, प्रश्न करने और स्वयं उत्तर खोजने का निमंत्रण देती है।

क्योंकि जब प्रश्न जीवित रहते हैं, तभी विचार जीवित रहते हैं।
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💬 ‘सिविक सेंस’ पर विशेष प्रतिक्रियाएँ
पुस्तक के विमोचन, अध्ययन एवं प्रचार-प्रसार के दौरान विभिन्न जनप्रतिनिधियों, शिक्षकों, लेखकों और पाठकों द्वारा व्यक्त किए गए विचार।
डॉ
डॉ. आदर्श किशोर
एसोसिएट प्रोफेसर
‘Civic Sense’ : सवालों से समाधान तक की वैचारिक यात्रा

कुछ दिन पहले बाड़मेर के युवा लेखक गोविंद जाणी की पुस्तक Civic Sense के विमोचन का अवसर मिला। आज इसे पूरा पढ़ने के बाद लगा कि यह केवल एक किताब नहीं, बल्कि सवाल करने, सोचने और समाधान तलाशने की यात्रा है।
और पढ़ें
कहानी, संवाद और ‘जिज्ञासा’ जैसे पात्रों के माध्यम से पुस्तक सामाजिक बंधनों, पूर्वाग्रहों, जाति-वर्ण व्यवस्था, शिक्षा, अवसर, असहमति और मानवीय व्यवहार जैसे विषयों पर गंभीर सवाल उठाती है।

पुस्तक की एक पंक्ति मन को छूती है—

“जंगल में रास्ते पहले से नहीं होते, कोई चलता है तो रास्ता बनता है।”

शायद यही इस पुस्तक का संदेश भी है—दुनिया को बेहतर बनाने के लिए पहले हमें सवाल करने और अपने विचारों को परखने का साहस करना होगा।

बामणोर गाँव के युवा लेखक गोविंद जाणी को इस विचारपूर्ण कृति के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

“जब विचार सो जाते हैं, परंपराएँ शासन करने लगती हैं।”

📖 पाठकों से अपील: इस पुस्तक को केवल पढ़ें नहीं, इसके सवालों पर ठहरकर सोचें, अपनी मान्यताओं को परखें और संभव हो तो इसे दूसरों तक भी पहुँचाएँ। शायद एक विचार ही किसी बदलाव की शुरुआत बन जाए।
क
कैलाश चौधरी ✓
पूर्व केंद्रीय मंत्री
श्री गोविंद जी जाणी ‘बामणौर’ द्वारा लिखित ‘Civic Sense : सवालों से समाधान तक की एक वैचारिक यात्रा’ पुस्तक का विमोचन किया।

सभ्य समाज के निर्माण, नागरिक चेतना और सामाजिक उत्तरदायित्व को गहराई से रेखांकित करती यह पुस्तक अत्यंत सराहनीय एवं प्रासंगिक है।
और पढ़ें
इस उत्कृष्ट साहित्यिक योगदान के लिए लेखक श्री गोविंद जी जाणी ‘बामणौर’ को हार्दिक बधाई एवं उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए अनंत शुभकामनाएँ।
दि
श्री दिनेश बोहरा
वरिष्ठ पत्रकार — Aaj Tak
बाड़मेर के युवा लेखक गोविंद जाणी की यह पुस्तक केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि समाज और स्वयं से सवाल करने के लिए प्रेरित करती है।

जाति, परंपराओं, पूर्वाग्रहों और सामाजिक जकड़नों से लेकर शिक्षा, संवेदनशीलता और मानवीय व्यवहार तक—यह पुस्तक हर पहलू पर सोचने को मजबूर करती है।

“जब विचार सो जाते हैं, परंपराएँ शासन करने लगती हैं।”
प
श्री पवन भंवरिया
असिस्टेंट प्रोफेसर
‘Civic Sense’ पढ़ते हुए लगा कि यह पुस्तक समाज में मौजूद उन विषमताओं और बुराइयों की ओर हमारा ध्यान खींचती है, जिन्हें हम रोज़ देखते हुए भी अब बुराई मानना छोड़ चुके हैं।

पहली कृति के रूप में यह एक अच्छा और विचार करने पर मजबूर करने वाला प्रयास है। इसे थोड़ा और रोचक बनाया जा सकता था, लेकिन पुस्तक की विषयवस्तु और उठाए गए सवाल मुझे व्यक्तिगत रूप से अच्छे लगे।
और पढ़ें
लेखक गोविंद जाणी को इस प्रयास के लिए हार्दिक बधाई और उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएँ।

मेरी अपील है—आप भी इस पुस्तक को पढ़ें और देखें कि इसके सवाल आपको अपने आसपास के समाज और खुद के बारे में क्या सोचने पर मजबूर करते हैं।
प
TR MR PANWAR
पुस्तक के बारे में व्यक्त प्रतिक्रिया
‘Civic Sense’ पढ़कर लगा कि यह केवल एक किताब नहीं, बल्कि हमें अपने समाज और अपनी मान्यताओं पर सोचने के लिए प्रेरित करने वाली वैचारिक यात्रा है।

कहानी, संवाद और ‘जिज्ञासा’ के माध्यम से पुस्तक सामाजिक बंधनों, पूर्वाग्रहों, शिक्षा, मानवीय व्यवहार और नागरिक चेतना जैसे विषयों पर गंभीर सवाल उठाती है।

“जंगल में रास्ते पहले से नहीं होते, कोई चलता है तो रास्ता बनता है।”
रा
श्री रविंद्र सिंह भाटी
विधायक — शिव
वास्तव में, देश को आज इन विषयों पर गंभीरता से विचार करने की विशेष आवश्यकता है। देश के युवाओं को आगे आना चाहिए और शिक्षाविदों को भी इन मुद्दों पर काम करने की जरूरत है। तभी हम एक बेहतर, सद्गुणी और जिम्मेदार नागरिकों वाला समाज बना सकेंगे।

ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर पुस्तक लिखने के लिए भाई गोविंद जाणी को बहुत-बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएँ। निश्चित रूप से यह ऐसी पहल है, जिसकी हमारे देश को आज आवश्यकता है।
बेहतर समाज की शुरुआत बेहतर विचारों से होती है

पाठकों की नज़र में ‘सिविक सेंस’ — वास्तविक प्रतिक्रियाएं
★★★★★ 5 / 5 (16 समीक्षाएं)

पाठकों की समीक्षाएं (16)

  1. ★★★★★

    Sir Namaskar
    Main Sushil Kumar Jaunpur UP
    Maine Civic Sense book Instagram par post dekhi, wahi se order ki Pehle maine socha tha ki aise hi koi normal book hogi Phir padhne ke baad pata chala ki aaj tak maine jo school, ghar aur college mein nahi seekha, woh mujhe is kitab ne sikha diya
    Hamare desh ka itna gira hua civic sense kyun hai Yahan ke nagrik itni gair zimmedarana harkatein kyun karte hain Agar apne ghar, parivar, samaj aur desh ko bachana hai, to civic sense strong hona bahut zaroori hai Thank you Sir, aapne itni haqeeqat batayi.

    Reply
  2. ★★★★★

    सर्वप्रथम आपको मेरा प्रेम भरा नमस्कार और इस किताब के लिए बहुत बहुत धन्यवाद,,,,, लेखक महोदय आपकी इस किताब ने हमें एक ऐसे मोड पर खड़ा कर दिया है कि या तो आपको सीखने के लिए अपने मन की सीमाओं को बड़ा करना पड़ेगा या अपने जीने के उद्देश्य को तमाम उम्र बिना किसी वजह ना समझता और भ्रम से गुजार दे,,,,,,,,, आपकी यह पुस्तक हमें जीने के असली मकसद तक पहुंचाती हैं। Thank you sir

    Reply
  3. ★★★★★

    Civic sense सिर्फ एक किताब ही नहीं है,एक हक़ीक़त नामा हैं।
    लेखक महोदय ने बहुत बेहतरीन तरीके से लिखा है,ऐसी किताब बहुत पहले आ जानी चाहिए थी, पढ़ने के बाद सोचने का नज़रिया बदल गया।
    आज के दौर में जहां हर क्षण इंसानियत को कुचला जाता हैं,हर आधे घंटे में एक महिला पर अत्याचार होता है,धर्म मजहब के नाम त्थ जहां रोजाना हत्याएं, दंगे होते हैं,उस दौर में सिविक सेंस के पात्र चेतना और उनके पति व जिज्ञासा बिटिया के विचारों को पढ़ते हैं और उसमें सबसे खास वो चित्र जो एक पहेली बना हुआ है,जिज्ञासा के वो प्रश्न जिसमें कहा गया कि “अगर इस दुनियां को दोबारा से बनाने का मौका मिले तो कैसी दुनियां चाहोगे”

    बहुत ही उम्दा,सुधी पाठकों को पढ़ने व समझने की गुजारिश करूंगा।

    Reply
  4. ★★★★★

    सिविक सेंस पुस्तक एक सामाजिक जीवन जीने की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक के रूप में है जो व्यक्ति को उसके व्यवहारिक जीवन की हर गतिविधि को किस विधि के साथ जीवन जीना चाहिए यह सिखाती है।
    सिविक सेंस पुस्तक अपने आप में बदलाव लाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है

    Reply
  5. ★★★★★

    सिविक सेंस पुस्तक एक सामाजिक जीवन जीने की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक के रूप में है जो व्यक्ति को उसके व्यवहारिक जीवन की हर गतिविधि को किस विधि के साथ जीवन जीना चाहिए।
    सिविक सेंस पुस्तक अपने आप में बदलाव लाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है

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  6. ★★★★★

    सिविक सेंस कहने में तो ये एक शब्द भर हो सकता है लेकिन इसकी गहराई में जाने पर ये जान पाते हैं कि जिस इंसान के अंदर ये सेंस आजाता है वो कंही भी अनुशासनहीनता का हिस्सा नहीं होगा,, किसी हिंसक भीड़ का हिस्सा नहीं होगा, उसे किसी कानून के पालन के लिए टोकना नहीं पड़ेगा। ऐसे ही एक परिपक्व इंसान का परिचय करवाती यह पुस्तक अनेकों रूढ़ियों को बदलने, समाज की वास्तविकताओं से परिचय करवाती है।
    सबको ओर विशेष कर zen Z को तो जरूर यह पुस्तक पढ़नी चाहिए।

    Reply
  7. ★★★★★

    यह एक समाज को जानने का मार्ग है ये हमे सिखाती है की समाज मे जाती धर्म लिग के आधार पर भेदभाव ना करना और दुनिया की हर तरह की दुनिया का नजरिये से वाजिब करवाते है समाज और सार्वजनिक स्थानों के प्रति अपने कर्तव्यों व जिम्मेदारियों को समझना। समाज मे फैल रही कुरूतियो का परित्याग करना समाज को सिविक सेंस एक नई दिशा देती है इस बुक का शीर्षक जब विचार सो जाते तब परम्पराए शासन करती है और विचार के लिए मन मे सवाल खङे करते है सोच पर मजबूर करती है अच्छी बुक है उम्मीद है समाज मे एक नई दिशा नई सोच नई विचारधारा लाएगी

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  8. ★★★★★

    Sawal puchna kitna jruri h …
    Ye book pdhne k bad smjh aaya
    Sawal puchne ki ek aadt or uske sahi jvab mil jana ..smaj m parivartan la skta h ..ek din m nhi lekin ek din jarur ….
    Jb prashn jivit rahte hai,tbhi vichar jivit rahte hai…😊😊
    Thank you so much bhai…

    Reply
  9. ★★★★★

    Sawal puchna kitna jruri h …
    Ye book pdhne k bad smjh aaya
    Sawal puchne ki ek aadt or uske sahi jvab mil jana ..smaj m parivartan la skta h ..ek din m nhi lekin ek din jarur ….
    Jb prashn jivit rahte hai,tbhi vichar jivit rahte hai…😊😊

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  10. ★★★★★

    After reading the book, my mind and heart were filled with questions. Each chapter generated new thoughts and questions. Each line compelled me to think. “Why?” felt like the word had been planted in my brain. After reading it, I felt a sense of “why?” This book wasn’t a book of words, sentences, and chapters; it was a philosophy. Each chapter offered a new lesson. Wisdom, consciousness, and curiosity aren’t just characters in this book; they’re a philosophy that every person should possess. The chapters of this book are complete, but the thoughts and questions that arose during and after reading it continue unabated. Before undertaking any action, one must abandon the notion of “mine” and cultivate a sense of “ours.” The chapters of this book have ended, but the thoughts haven’t. After reading the book, I will strive to bring positivity into my thoughts. 🙏
    Thanks Bro 👍

    Reply
  11. ★★★★★

    यह सिर्फ़ एक किताब नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय समाज का आईना है। उपन्यास 20वीं और 21वीं सदी की पीढ़ियों के बीच बढ़ते वैचारिक अंतर को बेहद सहजता से सामने रखता है। जाति के कारण टूटते रिश्तों और आत्महत्याओं की घटनाओं के बीच विवेक और चेतना का अंतरजातीय विवाह यह दिखाता है कि संवाद और समझदारी से परंपराओं की दीवारें भी टूट सकती हैं।
    लेखक ने जातिवाद, सामाजिक प्रथाओं, परंपराओं और रूढ़ियों को विवेक, चेतना और जिज्ञासा जैसे पात्रों के माध्यम से तार्किक दृष्टि से प्रस्तुत किया है।
    “महिलाएँ पैदा नहीं होतीं, बल्कि बनाई जाती हैं।”
    “जाति है, जो जाती ही नहीं है न जाने! इस जाति के कारण कितनी ही प्रेम कहानियाँ और ज़िंदगियाँ अधूरी रह गईं।”
    इस पुस्तक को पढ़कर महसूस होता है कि जब मनुष्य सोचना बंद कर देता है, तो परंपराएँ शासन करने लगती हैं और जब विवेक जागता है, तो रूढ़ियाँ सवालों के कटघरे में खड़ी हो जाती हैं। मेरा मानना है यह पुस्तक विशेष रूप से महिलाओं, लड़कियों, 11वीं–12वीं और कॉलेज विद्यार्थियों को अवश्य पढ़नी चाहिए।

    Reply
  12. ★★★★★

    आज के gen -z के लिए और उनके माता पिता के लिए ये बुक महत्वपूर्ण हैं वो एक बार अवश्य पढ़े और बुक में लिखी मूल बातों ओर लेखक महोदय के विचारों को समझे ।
    किस तरह एक महिला को समाज द्वारा महिला बनने के लिए मजबूर किया जाता हैं। किस तरह हमारे समाज का सिविक सेंस सो जाता हैं। किस तरह परंपराएं हम पर राज करने लगती है।
    आज हम दिन ब दिन अनेक घटनाएं देखते हैं जो नहीं होनी चाहिए थी फिर भी वो होती हैं तो वो क्यों होती उस समय उन में ये सिविक सेंस क्यों नहीं होता है । इस बुक में लेखक महोदय ने इन विचारों को एक पिता ओर बेटी के संवाद के रूप में समझाया है । इस किताब को पढ़कर आपके बहुत सारे विचार ओर गलत धारणाएं बदले गी।
    मैने बुक को पूरा पढ़ा है मुझे अच्छी लगी आप भी जरूर पढ़े
    धन्यवाद लेखक महोदय।

    Reply
  13. ★★★★★

    अक्सर हमारे परिवार और समाज में हमें दूसरों की इच्छा, असहमति और उनके अपने फैसलों का सम्मान करना नहीं सिखाया जाता। हम बहुत-सी बातें परंपरा के नाम पर स्वीकार करते जाते हैं, बिना यह सोचे कि सामने वाले की अपनी इच्छा क्या है।
    ‘सिविक सेंस’ पढ़ने के बाद मुझे लगा कि यह किताब सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं है, बल्कि हर घर में होने और पढ़े जाने लायक है।
    इस बार रक्षाबंधन पर मैं अपने भाई को राखी के साथ ‘सिविक सेंस’ भी गिफ्ट करूंगी। मुझे लगता है कि भाई को इससे बेहतर कोई ऐसा तोहफ़ा नहीं हो सकता, जो उसे कुछ नया सोचने के लिए मजबूर करे।
    किताब पढ़ते-पढ़ते मेरे मन में एक और बात आई—अगर हर घर में विवेक जैसा पिता, चेतना जैसी पत्नी और जिज्ञासा जैसी बेटी हो, तो परिवार कितना सुंदर और संवादपूर्ण हो सकता है। ऐसा परिवार जहाँ सवाल पूछने की आज़ादी हो, असहमति को जगह मिले और एक-दूसरे की इच्छाओं और विचारों का सम्मान किया जाए।
    मुझे इस किताब की सबसे अच्छी बात यही लगी कि यह हमें समाज की बड़ी-बड़ी समस्याओं पर भाषण नहीं देती, बल्कि घर और हमारे रोज़मर्रा के व्यवहार से सवाल करना शुरू करती है। लेखक गोविंद जाणी जी का धन्यवाद, हमें समाज की उन सच्चाइयों से रूबरू करवाने के लिए जिन्हें हम अक्सर देखते तो हैं, लेकिन उनके बारे में सोचते नहीं।
    ‘सिविक सेंस’ सिर्फ समाज को बदलने की बात नहीं करती, पहले हमें खुद से सवाल करना सिखाती है।

    Reply
  14. ★★★★★

    सिर्फ़ एक किताब नहीं, समाज को देखने का एक नया नज़रिया…

    भेदभाव, जातिवाद, गरीबी, नागरिक जिम्मेदारी और सार्वजनिक स्थानों के प्रति सम्मान जैसे मुद्दों को समझाती एक सार्थक किताब — “सिविक सेंस”।

    इस किताब ने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर किया।
    विवेक का अर्थ है जानना और जानने की पहली शर्त है यह मानना कि अभी और जानना बाकी है।

    कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनका जवाब आसान नहीं होता,
    और जो आसान है, वह हमेशा सच हो — यह ज़रूरी नहीं।

    “Survivorship Bias” —
    जो सफल हुआ, उसकी कहानी दिखाई देती हैं;
    जो सफल नहीं हुए, वे अक्सर अंधेरे में रह जाते हैं।

    शायद किताबें हमें सिर्फ जानकारी नहीं देतीं,
    बल्कि हमारी सोच को थोड़ा और बेहतर बनाने का मौका देती हैं। ✨

    Reply
  15. ★★★★★

    नया विचार नया समाज दिखावे से वास्तविक जीवन की ओर घुटन भरी जिंदगी से बार निकालने का अति उतम प्रयास

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