वॉशिंगटन/लॉस एंजिल्स:
अमेरिका में सोशल मीडिया दिग्गज कंपनी Meta Platforms को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी सुनवाई चल रही है। इस मामले में कंपनी के CEO Mark Zuckerberg से अदालत में फेसबुक और इंस्टाग्राम के प्रभाव को लेकर कड़े सवाल पूछे गए।
मामला इस बात से जुड़ा है कि क्या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस तरह डिज़ाइन किए गए हैं जिससे बच्चे और किशोर लंबे समय तक ऑनलाइन बने रहें — और क्या इसका उनकी मानसिक सेहत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
क्या हैं मुख्य आरोप?
अदालत में प्रस्तुत दावों के अनुसार:
• Facebook और Instagram की एल्गोरिद्म प्रणाली यूजर्स को अधिक समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने के लिए तैयार की गई है।
• आयु सत्यापन (Age Verification) व्यवस्था पर्याप्त रूप से प्रभावी नहीं मानी जा रही।
•कुछ शोधों में यह संकेत मिला है कि अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग किशोरों में तनाव, चिंता और आत्मविश्वास की कमी से जुड़ा हो सकता है।
हालाँकि, यह ध्यान देने योग्य है कि इन दावों पर अंतिम निर्णय अभी अदालत द्वारा नहीं दिया गया है।
अदालत में क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान Mark Zuckerberg से पूछा गया कि क्या कंपनी को किशोरों पर संभावित मानसिक प्रभावों की जानकारी थी।
रिपोर्ट्स के अनुसार, Meta की ओर से कहा गया कि कंपनी लगातार सुरक्षा उपायों को बेहतर बना रही है, जिसमें:
• पैरेंटल कंट्रोल टूल्ससमय सीमा (Screen Time Limits)
• संवेदनशील कंटेंट फिल्टर
• आयु सत्यापन सुधार
जैसे कदम शामिल हैं।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म का प्रभाव पूरी तरह नकारात्मक या सकारात्मक नहीं कहा जा सकता।
कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि:
सोशल मीडिया सामाजिक जुड़ाव बढ़ा सकता हैलेकिन अत्यधिक उपयोग मानसिक दबाव भी बढ़ा सकता हैइसलिए संतुलित उपयोग और अभिभावकीय निगरानी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह मुकदमा केवल Meta तक सीमित नहीं है। इसका असर पूरे सोशल मीडिया उद्योग पर पड़ सकता है।
यदि अदालत सख्त निर्देश जारी करती है, तो संभव है कि:
• बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े नए कानून बनें
• एल्गोरिद्म पारदर्शिता बढ़े
• आयु सत्यापन नियम मजबूत किए जाएँ
• कंटेंट मॉडरेशन नियम सख्त हों
क्यों जरूरी है यह फैसला? (Impact on India & World)–
यह मुकदमा केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। इसका संभावित प्रभाव भारत जैसे बड़े डिजिटल बाजारों पर भी पड़ सकता है, जहाँ करोड़ों बच्चे और किशोर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं।
अगर अदालत सख्त दिशा-निर्देश जारी करती है, तो इसके असर वैश्विक स्तर पर देखने को मिल सकते हैं:
नियमों में सख्ती–
संभव है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर नए या और कड़े कानून लागू किए जाएँ। भारत सहित कई देशों में “सोशल मीडिया सेफ्टी” को लेकर नई नीतियाँ बन सकती हैं।
भारी आर्थिक दंड-
यदि अदालत कंपनी की जिम्मेदारी तय करती है, तो बड़े स्तर पर जुर्माना या नियामकीय कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
डिजिटल जागरूकता में वृद्धि-
यह मामला अभिभावकों को बच्चों की डिजिटल गतिविधियों पर अधिक ध्यान देने के लिए प्रेरित कर सकता है। विशेषज्ञ संतुलित स्क्रीन टाइम और ऑफलाइन गतिविधियों के महत्व पर जोर दे रहे हैं।
निष्कर्ष: क्या हम अपने बच्चों को डिजिटल जोखिम से बचा पाएंगे?
तकनीक स्वयं बुरी नहीं होती, लेकिन उसका उपयोग और डिज़ाइन किस प्रकार किया गया है, यह महत्वपूर्ण है।
सोशल मीडिया आज संचार और जानकारी का शक्तिशाली माध्यम है, परंतु संतुलित उपयोग ही सुरक्षित उपयोग है।
National People Voice अपने पाठकों से अपील करता है कि वे:
• बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखें
• पैरेंटल कंट्रोल टूल्स का उपयोग करें
• डिजिटल दुनिया के साथ-साथ बाहरी गतिविधियों को भी प्रोत्साहित करें
डिजिटल युग में जागरूकता ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।
