23 मार्च 1931 — भारतीय इतिहास का वह दिन जब लाहौर सेंट्रल जेल में तीन अमर क्रांतिकारी भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर को फांसी दी गई। यह सिर्फ एक सज़ा नहीं थी — यह एक पूरी न्यायिक प्रक्रिया का परिणाम था जिसमें उनके अपने साथियों ने उनके खिलाफ गवाही दी। आज 23 मार्च 2026 को हम उन सभी तथ्यों को वेरिफाई कर, पूरी सच्चाई आपके सामने रख रहे हैं।
इस लेख में क्या है
भगत सिंह: बचपन से क्रांति तक —
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर ज़िले के बंगा गांव (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उनका परिवार पहले से ही स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय था। जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा और अंग्रेजी हुकूमत के प्रति उनके मन में विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी।
उन्होंने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA)जॉइन की। वे सिर्फ एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि एक गहरे विचारक और लेखक भी थे — उनका मानना था कि “क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।”
सांडर्स हत्या और असेंबली बम कांड — वेरिफाइड तथ्य
17 दिसंबर 1928 को लाला लाजपत राय की लाठीचार्ज में मृत्यु के बदले में भगत सिंह, राजगुरु और जय गोपाल ने मिलकर ब्रिटिश अधिकारी जॉन सॉंडर्स (जो असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट थे और जेम्स स्कॉट समझकर निशाना बनाए गए) को गोली मार दी। इस घटना में जय गोपाल ने सिग्नल दिया और राजगुरु ने गोली मारी, भगत सिंह ने पीछे से कवर किया।
8 अप्रैल 1929को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका — यह बम मारने के लिए नहीं, बल्कि दमनकारी कानूनों के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए था। दोनों ने स्वयं गिरफ्तारी दी ताकि अदालत को मंच बनाकर अपना संदेश पूरे देश तक पहुंचा सकें।
लाहौर षड्यंत्र केस — फांसी की गवाही का पूरा सच (मुख्य मुद्दा)
यह इस पूरी कहानी का सबसे अहम और सबसे कम जाना गया अध्याय है।
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दिलाने के लिए किसने गवाही दी?
अभियोजन पक्ष (Prosecution) का पूरा मामला मुख्यतः पांच सरकारी गवाहों (Approvers) की गवाही पर टिका था — जय गोपाल, फणींद्र नाथ घोष, मन मोहन बनर्जी, हंसराज वोहरा और ललित कुमार मुखर्जी — क्योंकि भगत सिंह और अन्य आरोपियों के खिलाफ कोई सीधा प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं था।
पांचों सरकारी गवाहों की भूमिका — विस्तार से
① हंसराज वोहरा (Hans Raj Vohra) — सबसे निर्णायक गवाह
हंसराज वोहरा की गवाही लाहौर षड्यंत्र केस (1929-30) में “भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को मृत्युदंड दिलाने में निर्णायक” साबित हुई — यह बात लेखक कुलदीप नैयर ने अपनी पुस्तक *The Martyr: Bhagat Singh – Experiments in Revolution* (2000) में लिखी है।
वोहरा HSRA के भरोसेमंद सदस्य थे। वोहरा की गवाही मुख्यतः भगत सिंह की गतिविधियों पर केंद्रित थी। वोहरा ने मई 1929 में दूसरी बार गिरफ्तार होने पर सरकारी गवाह बनना स्वीकार किया। उनके अनुसार उन्हें बताया गया था कि उनके गुरु सुखदेव ने पहले ही सारी जानकारी दे दी है — इस पर वे टूट गए।
② जय गोपाल (Jai Gopal) — सांडर्स हत्या का प्रत्यक्षदर्शी
जय गोपाल की गवाही मुख्यतः सांडर्स की हत्या पर केंद्रित थी। जय गोपाल स्वयं उस अपराध में शामिल था और घटनास्थल पर उसकी उपस्थिति अन्य साक्ष्यों से भी सिद्ध हो चुकी थी। उसने अदालत में बताया कि किसने कब और कहां क्या योजना बनाई।
जब जय गोपाल सरकारी गवाह के रूप में गवाही दे रहा था, तब अभियुक्त पेम दत्त ने उस पर एक चप्पल फेंकी। यह दृश्य इस बात का प्रमाण है कि क्रांतिकारियों में उसके प्रति कितना रोष था।
③ फणींद्र नाथ घोष (Phonindra/Phanindra Nath Ghosh)
फणींद्र नाथ घोष की गवाही मुख्यतः हिंदुस्तान सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना और उसके नेटवर्क के बारे में थी।
④ मन मोहन बनर्जी (Man Mohan Bannerji)
HSRA के संगठनात्मक ढांचे और सदस्यों की पहचान के बारे में बयान दिया।
⑤ ललित कुमार मुखर्जी (Lalit Kumar Mukerji)
इन्होंने संगठन की गतिविधियों और भगत सिंह के विभिन्न शहरों में आवागमन के बारे में गवाही दी।
ट्रिब्यूनल: न्याय नहीं, फैसला पहले से तय था
वायसराय लॉर्ड इरविन ने 1930 में अध्यादेश III जारी कर तीन हाई कोर्ट जज़ों का एक विशेष ट्रिब्यूनल गठित किया ताकि मुकदमा जल्दी निपटाया जा सके। इस अध्यादेश ने सामान्य अपील और पुनरीक्षण के अधिकारों को समाप्त कर दिया और ट्रिब्यूनल को आरोपियों की अनुपस्थिति में भी सुनवाई जारी रखने का अधिकार दे दिया।
26 अगस्त 1930 तक अभियोजन पक्ष ने 457 गवाहों से पूछताछ की और फिर अपना पक्ष बंद कर दिया। बचाव पक्ष की ओर से कोई गवाह पेश नहीं किया गया। 7 अक्टूबर 1930 को ट्रिब्यूनल ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को मृत्युदंड सुनाया।
गवाहों को मिला इनाम — Tribune की रिपोर्ट से वेरिफाइड
फांसी के बाद सभी चारों सरकारी गवाहों को पुरस्कृत किया गया। जय गोपाल को ₹20,000 का नकद इनाम मिला। फणींद्र नाथ घोष और मन मोहन बनर्जी को बिहार के चंपारण जिले में 50-50 एकड़ ज़मीन दी गई। हंसराज वोहरा को पंजाब सरकार की तरफ से लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ने के लिए भेजा गया।
यही नहीं, जेल सुपरिंटेंडेंट मेजर पी.डी. चोपड़ा को फांसी के दो दिन बाद ही DIG (जेल) के पद पर पदोन्नत कर दिया गया। लाहौर षड्यंत्र केस के जांच अधिकारी खान बहादुर शेख अब्दुल अज़ीज़ को ब्रिटिश राज के 200 वर्षों में एकमात्र उदाहरण के रूप में — हेड कांस्टेबल से DIG तक — असाधारण पदोन्नति दी गई।
फांसी: 23 मार्च 1931 — इतिहास की वह शाम
23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई। फांसी लाहौर के शाहदरा के काला मसीह नाम के जल्लाद ने दी। उस समय जेल के बाहर प्रदर्शनकारियों के जमा होने की आशंका से, सामान्य जेल परंपरा (सुबह फांसी) को तोड़कर शाम को ही फांसी दी गई।
फांसी पर चढ़ते वक्त भगत सिंह के होठों पर था — “इंकलाब ज़िंदाबाद!”
आज भी ज़िंदा है वह विचार
भगत सिंह महज़ एक क्रांतिकारी नहीं थे — वे एक विचारधारा थे। युवाओं में जागरूकता, सामाजिक समानता और अन्याय के खिलाफ सवाल उठाने की हिम्मत — यही उनकी असली विरासत है।
अगर हम सच में भगत सिंह के प्रशंसक हैं, तो उनकी तस्वीर लगाने से ज़्यादा ज़रूरी है — उनकी सोच को समझना और उन पर सवाल उठाने का साहस रखना।
क्या आपको लगता है कि इतिहास ने इन मुखबिरों के साथ न्याय किया? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।”
